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Thursday, July 15, 2010

दर्द मे लिपटी ग़ज़ल है

दर्द मे लिपटी ग़ज़ल है अब हमारी आपकी
लिख रही केवल असल है अब हमारी आपकी

जिस तरफ देखो नज़ारा एक ही मिल जायेगा
हर कोई करता नक़ल है अब हमारी आपकी

प्यार मे जब तक अहं था तब तलक मुश्किल लगी
राह ये कितनी सरल है अब हमारी आपकी

आपके ये रंग जब तक ज़िन्दगी के साथ हैं
हर सुबह मीठी तरल है अब हमारी आपकी

कल 'रमा' रंगीन सपने ही जहाँ देखे गए
आज क्यों आँखों मे जल है अब हमारी आपकी

Wednesday, July 14, 2010

आंसुओं के घर में भी

आंसुओं के घर में भी ज़िन्दादिली की बात कार
ये घुटन वाले हैं घर तू रोशिनी की बात कार

हर कदम पे मौत मेरे साथ में चलती ही है
इसलिए कहती हूँ तुझसे ज़िन्दगी की बात कार

दर्द अपना, आह अपनी मन के घर में बंद रख
यों न हर पल जग से अपनी बेबसी की बात कर

ज़िन्दगी जीने का तू ये भी सलीका सीख ले
सब के संग नेकी ही कर,तू मत बदी की बात कर

ये बनावट बाँट देगी तुझको टुकड़ो में 'रमा'
हो सके तो सादगी से सादगी की बात कर