Monday, July 5, 2010

यों न होठों से

यों न होठों से ही बस लब्ज़े-मुहब्बत बोलते
बात तो तब थी जो बन के मेरी किस्मत बोलते

राह का पत्थर समझ कर तुमने तो ठुकरा दिया
जो तराशा तुमने होता बन के मूरत बोलते

पत्थरों के देश में ये आइने क्यों चुप रहे
टूटना ही था जो गिर के, कैसी दहशत, बोलते

फूल के होठों की छुअनें गर मिली होतीं तो फिर
कोरे-कागज़ भी ये बन कर प्यार का खत बोलते

बोलना ही था 'रमा' तो इस जहाँ के सामने
तेरे चेहरे में बसी है उसकी सूरत बोलते

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